Tuesday, October 6, 2015

मर्यादा लाँघने की छटपटाहट ?


 **********माननीय जस्टिस मार्कण्डेय काटजू साहब (सेवा निवृत) !
*विभिन्न न्यायालयों में जिस तस्वीर के नीचे बैठकर वर्षों आपने अनेक न्यायिक फ़ैसले सुनाये हैं, उनको राष्ट्र का पिता कहा जाता है, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी। अब भला इंसान का पिता तो होता है, देश का पिता कोई कैसे हो सकता है ?
*धरती को लोग माता कहते हैं, धरती माता। अब भला ज़मीन भी कहीं किसी की माँ हो सकती है ?
*भारत के बहुत से लोग अपने देश को भारत माता कहते हैं। अब बताइए, कोई देश भी कहीं किसी की माँ या बाप हो सकता है ?
*भारत में कभी दूध की नदियाँ बहा करती थीं। भारत कभी सोने की चिड़िया था। ये कैसी "उट-पटांग" बातें लोग करते रहते हैं ? 
**********मगर ताज्जुब है, आपने ऐसी "उट-पटांग" बातों के लिये कभी अपना श्रीमुख खोला ही नहीं ! जैसा गाय को माँ बता देने पर आप बिफर पड़े हैं। गाय से इंसान के "बायोलॉजिकल" रिश्ते की आप व्याख्या करने लग गये। 
**********माननीय काटजू साहब, क्या आप सदैव शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning) के आधार पर ही फ़ैसले करते रहे हैं, क्या आपने कभी सन्दर्भ (Context) देखा ही नहीं ?
**********माननीय काटजू साहब, आपने बेहद सम्मानित पदों पर कार्य-निर्वहन किया है। अपना न सही, कम से कम उन गरिमामयी पदों की मर्यादाओं का मान तो रख लीजिये, या क्षुद्र राजनीति के कीचड़ में उतर कर ही मानेंगे ? 
*अनेश कुमार अग्रवाल 
06 अक्टूबर, 2015   

Monday, September 14, 2015

१४ सितम्बर, हिन्दी दिवस

 
       प्रत्येक वर्ष १४ सितम्बर को हिन्दी दिवस की "बर्थ-डे" मनाने की रस्मअदायगी वाली मानसिकता को छोड़कर हिन्दी के उपयोग, प्रचार, प्रसार हेतु दृढ़-संकल्पित होने की प्रतिज्ञा करने के दिवस के रूप में मनाना चाहिये। इसके अतिरिक्त हिन्दी के निहितार्थ पूर्व में किये गये स्वयं के योगदान, यदि कोई रहे हों, का आत्मनिरीक्षण भी अवश्य किया जाना चाहिये।
*अनेश कुमार अग्रवाल 
१४ सितम्बर, २०१५ 

Sunday, August 2, 2015

तारीख़ पर तारीख़.... !


     भारत जैसा देश जहाँ लाखों-करोड़ों मुकदमें केवल वर्षों से ही नहीं बल्कि दशकों से अदालतों में धूल फाँक रहे हों, वहाँ अदालतों में गर्मियों की, सर्दियों की, हफ्तों-महीनों की छुट्टियाँ कर देना भारतीय आम जनमानस के प्रति घोर क्रूरतम अन्याय है|
      "Justice delayed is justice denied and JUSTICE OVER-DELAYED IS INJUSTICE DONE"   
     न्याय-प्रक्रिया में अनुचित विलम्ब का एक ताज़ातरीन उदाहरण यह देखने में आया है कि बहुधा विधिक-समुदाय (Legal Fraternity) से जुड़े व्यक्ति की मृत्यु, जोकि एक अटल सत्य है, के मामले में न्यायालय की कार्यवाही शोक-सभा (Condolence) के नाम पर पूरे दिन के लिये स्थगित कर दी जाती है। परिणामतः न्याय होने में विलम्ब की दरार और चौड़ी होती चली जाती है। 'तारीख़ पर तारीख़' वाला ज़ुमला बेरोकटोक चलता रहता है। निःसंदेह मृत्यु कितनी भी अटल क्यों न हो, संवेदनाये जगाने वाली होती है, कष्टकारी होती है, लेकिन 'शोक-सभा' क्या अदालती कामकाज के बाद सायंकाल 05:00 बजे नहीं आहूत की जा सकती है? पूरे दिन की छुट्टी का क्या औचित्य है? इसके अलावा, आये दिन बार-एसोसिएशन के कार्य-स्थगन प्रस्ताव, कोई विपरीत आदेश न किये जाने का प्रस्ताव (No Adverse Order) आदि-आदि पर भी प्रभावी रोक लगनी चाहिये, क्योंकि न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया को विलंबित करने में यह भी बड़ा कारण हैं।
     मैं अपने वारे में यह घोषणा करना चाहता हूँ, कि मेरी मृत्यु पर मेरे सम्मानित अधिवक्ता-बन्धुओं के ह्रदय में मेरे प्रति यदि तनिक भी सहानुभूति, संवेदना हो, तो मेरी मृत्यु के दिन सामान्य से आधा-एक घंटा अधिक न्यायालय का कार्य करें, अवकाश कदापि न करें, यही मुझे श्रद्धांजलि होगी।
 *अनेश कुमार अग्रवाल 
02 अगस्त, 2015 

Wednesday, July 29, 2015

दया याचिकायें !

    स्वच्छ  न्याय के प्रशासन (Fair Administration of Justice) हेतु अब यह अनिवार्य हो गया है कि संसद और न्यायपालिका को यह तय कर देना चाहिये कि एक "दोषी" कितनी बार राष्ट्रपति महोदय और राज्यपाल महोदय के पास दया-याचिका दाखिल कर सकता है। अमुक "दोषी" के द्वारा बार-बार दया-याचिकायें दाख़िल करना और इन संस्थानों के द्वारा विचारार्थ स्वीकार कर लेना क्या विधि-सम्मत है या न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया में उल्लंघन ?
     इसके अतिरिक्त लंबित दया-याचिकाओं के निपटारे की समय-सीमा का अभिनिर्धारण भी होना चाहिये।
*अनेश कुमार अग्रवाल
29.07.2015

Wednesday, June 10, 2015

शाहजहाँपुर के पत्रकार की निर्मम हत्या !

श्री जगेन्द्र सिंह
शाहजहाँपुर के निर्भीक पत्रकार श्री जगेन्द्र सिंह को हार्दिक श्रद्धांजलि !

      अंततः आम-जनमानस की आवाज़ रंग लायी।                                                                                                                                              

Saturday, May 30, 2015

"अपील" और "रिवीजन" की अवधारणा

     स्वच्छ न्याय प्रशासन (Fair Administration of Justice) की अवधारणा में "अपील" और "रिवीजन" के अन्तर्गत पूर्व निर्णयों को केवल पलट देना या यथावत रखना ही नहीं आता है, अपितु जानबूझकर की गयीं त्रुटियाँ (Intentional Mistakes) एवं पूर्व निर्धारित सोच-विचारकर किये गये न्यायिक उल्लंघन (Predetermined Deliberate Judicial Violations) पाये जाने की दशा में कड़ी निंदा (Strictures) एवं कठोर दण्ड (Severe Punishment) का प्रावधान भी अनिवार्य रूप से होना चाहिये, तभी अधीनस्थ न्यायिक फ़ोरम (Subordinate Judicial Forum) के कदाचार, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि पर प्रभावी रोक सम्भव हो सकती है। अन्यथा उदाहरणस्वरूप- कभी वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट, कभी राजनेता के हितबद्ध होने की दशा में और कभी रिश्वतखोरी की दशा में "गणतन्त्र दिवस" 26 जनवरी के सार्वजानिक अवकाश के दिन भी लेखपाल, राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार के द्वारा वाद भूमि-स्थल की 'स्पॉट' रिपोर्टें तैयार होती रहेंगी, तथा अगले दिन रविवार को इनकी लखनऊ न्यायालय द्वारा स्वीकारता होती रहेगी, और कभी निम्नवर्णित क्रिया-कलाप होते रहेंगे :-


Sunday, May 17, 2015

भारतीय न्यायप्रणाली का छिपा घातक सच !

     भारतीय न्यायप्रणाली में विभिन्न स्तरों पर अनेकों न्यायिक अधिकरण (Judicial Forums) हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट, हाई-कोर्ट, जनपदीय स्तर पर दीवानी कोर्ट; फ़ौज़दारी कोर्ट, विभिन्न ट्रिब्यूनल प्रमुखता से शामिल हैं। इनके अतिरिक्त आयोग (कमीशन), परिषद (बोर्ड), उपभोक्ता अदालतें (कंज्यूमर कोर्ट्स), राजस्व न्यायालय (रेवेन्यू कोर्ट्स) आदि भी हैं।
     उच्च न्यायिक अधिकरणों को छोड़कर उपरोक्त अनेकों जुडिशियल फ़ोरम्स में न्यायिक अधिकारियों के अलावा ग़ैर न्यायिक अधिकारी भी जज या पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) के रूप में फ़ैसले देते हैं। आश्चर्यजनक रूप से ऐसे ग़ैर न्यायिक अधिकारी विभिन्न अधिनियमों, कानूनों, नियमों आदि की व्याख्या, विवेचना और 'सुनवाई' करके "फैंसले" दे रहे हैं, जिन्होंने औपचारिक रूप से न तो कानून की पढ़ाई करके कानून की कोई डिग्री प्राप्त की है और न ही कोई कानूनी योग्यता औपचारिक रूप से प्राप्त की है।
     यह एक काला सच है कि इनके द्वारा दिये गये तमाम "फ़ैसले (Judgements)" बहुधा उनके अधीनस्थ बैठे लोग या कोई "और" तैयार कर रहे और लिख रहे हैं, क्योंकि 'आदेश और निर्णय'  तो इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर "रिज़र्व" ही कर लिये जाते हैं। ऐसे में न्याय की गुणवत्ता के स्तर का और निष्पक्षता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिये।
     मसलन, भारत में वक़ील (अधिवक्ता या एडवोकेट) बनने के लिये एल०एल०बी० की डिग्री अनिवार्य है, जज बनने के लिये नहीं !
     राजस्व न्यायालयों का एक कड़वा सच और : विभिन्न स्तरीय राजस्व न्यायालयों का एक कड़वा सच और भी है, कि नायब-तहसीलदार, तहसीलदार, एस०डी०एम०, ए०डी०एम०, डी०एम०, असिस्टेंट कमिशनर, कमिशनर जैसे अधिकारीगणों का अक्सर "प्रशासनिक कार्यों" में व्यस्त रहना बताया जाता है, बहुधा यह स्वाभाविक भी होता है। मतलब सीधा सा - न्यायिक कार्य ठप्प !
     समझ से परे है कि इन प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त अफसरों को न्यायिक कार्य सौंपने की व्यवस्था का औचित्य क्या है? एक तो प्रथम- ये अधिकारी प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं और दूसरे- कुछ अपवादों को छोड़कर इनको औपचारिक कानूनी ज्ञान भी नहीं होता।
     इसका भयानक परिणाम ये होता है कि राजस्व मामलों का वर्षों ही नहीं बल्कि दशकों तक लटके रहना और अभूतपूर्व रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और पक्षपात को प्रश्रय। और अगर कहीं कोई 'सीनियर ब्यूरोक्रेट' स्वयं या उसका कोई नज़दीकी मुक़दमे में पक्षकार या हितबद्ध (Interested) हुआ तो फिर फ़ैसला उसके विरुद्ध कैसे किया जा सकता है, और वह भी "सबॉर्डिनेट एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर" के द्वारा।
     इसके अतिरिक्त राजस्व अदालतों का क्या कोई दिवस और समय निर्धारित होता है? यदि हाँ- तो क्या इस निर्धारण का कड़ाई से पालन होता है? यदि नहीं- तो लंबित मामलों के पक्षकारों  के पास प्रतिकारी उपाय (Remedial Measures) क्या-क्या उपलब्ध हैं? या फ़िर तारीख़-पर-तारीख़? यदि कोई राजस्व न्यायालय अमुक किसी मामले में हितबद्ध है तो फिर वाद दायर होने के एक-दो महीने के अंदर फ़ैसला, और वह भी क़ानूनी प्रावधानों, नियमों को ताक पर रखकर? दोषियों के लिये सज़ा का क्या कोई निर्धारण है? स्वाभाविक विधिक चूक की तो 'रिवीजन' या अपील में ठीक किया जाना सामान्य विधिक प्रक्रिया है, लेकिन जानबूझकर की गयी चूक को कठोरता के साथ दण्डित भी किया जाना चाहिये।
     **याद रहना चाहिये, किसान की ज़िन्दगी का एक-मात्र सहारा उसकी ज़मीन के अन्यायपूर्ण तरीक़े से छिन जाने की जब नौबत आ जाती है तो फिर फ़ौज़दारी मामलों का भी जन्म होने लगता है, क्योंकि न्याय से नाउम्मीद हो चुका अच्छा-भला इंसान भी क़ानून को अपने हाथ में लेने से फिर संकोच नहीं करता है।
     अतः तुरंत और प्रभावी समाधान अपेक्षित है। नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice), विधि का शासन (Rule of Law), यथोचित विधि प्रक्रिया (Due Process of Law) जैसे विधिक मानदंडो का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिये। अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये।**
अनेश कुमार अग्रवाल 
17.05.2015